Saturday, August 13, 2022

क्या दागी अफसर बदलेंगे शिक्षा के आयाम?

बिलासपुर– छत्तीसगढ़ राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों की व्यापक फेर बदल हुई है, जिसमें कई अधिकारी के विभाग परिवर्तित कर दिए गए। जहां कुछ के लिए ये अच्छी खबर बन के आई, वहीं कुछ बदलाव समझ से परे है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव शिक्षा विभाग में हुई। नए प्रमुख सचिव आलोक शुक्ला जिन पर भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मुकदमा चल रहा है, उन्हें मात्र चार महीने के लिए प्रभार दे दिया गया है।
आते ही उन्होंने राज्य स्तरीय चलने वाली सारी योजना को गलत और बेकार बता कर अपनी ही योजना को अमलीजामा पहनाना भी शुरू कर दिया। यहां ध्यान देने वाली बात ये भी है, कि जिन योजनाओं को बेकार बताया गया, उसी को अभी अभी पुरस्कृत किया गया है, इतना ही नही उसे पूरे देश भर में सराहा भी गया।

सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार द्वारा केंद्र स्वीकृत “ई-लर्निंग की योजना” जिसमें स्कूल में डिजिटल तरीके से पढ़ने पढ़ाने की व्यवस्था है, जिसका उदघाटन मुख्यमंत्री ने स्वयं अपने हाथो से किया था, उसको भी अयोग्य ठहराया गया। इस महत्वाकांक्षी एवम् बच्चों के लिए लाभकारी योजना, जिसमें सारे तकनीक, लैपटॉप, कंप्यूटर इत्यादि को पूर्व में ही स्वीकृत कर लिया है तथा जिसमें इंस्टॉलेशन का काम भी पूरा हो गया तथा जिसके कारण तकरीबन 1500 रोजगार के अवसर मिलते, अब इसके बदले उन्होंने अपनी ही ई-लर्निंग कार्यक्रम की योजना बनाई है। इसमें योजना में आने वाले 4 महीनों में ही तकरीबन 50 करोड़ से ज्यादा सरकारी रुपए खर्च की योजना है, जिसमें फिर से वही हार्डवेयर और तकनीक को दुबारा से खरीदने का कार्यक्रम तैयार किया गया है। जब राज्य में पहले से ही इस प्रकार की व्यापक व दूरगामी योजना चल रही है, तो फिर से इसके समानांतर योजना चलाने का क्या मकसद हो सकता है?
यहां सवाल उठता है, कि किस आधार पर इस प्रकार का निर्णय लिया गया। इसकी उपयोगिता और प्रभाव को कैसे साबित करेंगे? साथ ही 4 महीने पश्चात फिर से इस योजना का क्या होगा? क्या ये जनता के पैसे का दुरुपयोग नहीं है? साथ ही अगर कोई नुकसान हुआ तो इसकी भरपाई कौन करेगा?
हमारे सूत्रों ने नाम न छापने शर्त पर यह बताया कि इस योजना में ऐसा दिखाया जाएगा कि राज्य के विद्यालयों ने सारे संबंधित समान खरीदे, जबकि सारी खरीदारी एवम् निर्णय पहले ही ले लिए है। राज्य में अधिकारियों द्वारा
छापेख़ाने से होने वाली कमाई पर जहां नकेल कसी थी वहीं ये काम भी अब शुरू होने वाला है।

केंद्र समर्थित योजना जैसे UDISE को भी बकवास बता कर उसमे कुछ भी डाटा भर के भेजने को बोल दिया गया। यह डाटा राज्य के लिए बहुत ही अहम है क्योंकि इसी आधार पर राज्य शिक्षा विभाग में सारी मूलभूत सुविधाएं एवम् कार्यक्रम लागू करता है । यही नहीं केंद्र से मिलने वाली मदद राशि में भी इसकी अहम भूमिका होती है।

ऐसे स्तर से इस प्रकार की बातों का नीचे के पदाधकारियों में जाना जहा अच्छे कर्मठ एवम् ईमानदार लोगों के मनोबल को नुकसान पहुंचता है वहीं भ्रष्ट अधिकारी इसमें अपना लाभ निकाल लेते है। एक ऐसे दागी अधिकारी जिस पर पिछली सरकार में इतने बड़े घोटाले का आरोप लग चुका हो, क्या राज्य की वर्तमान सरकार को उन्हें शिक्षा जैसा विभाग देना उचित है।
आपको बता दें, कि आलोक शुक्ला व उनके साथ के अधिकारियों पर पिछले सरकार में 3 हजार करोड़ के घोटाले का मुकदमा चल रहा, जिस मामले में वे बेल पर हैं।

शिक्षा एक ऐसा विभाग है, जो आम जनता पर सीधे प्रभाव डालता है। लोगों को प्रदेश की सरकार से आशा है, कि इस पर ध्यान दिया जाएगा, आम जन की बेहतरी के लिए राज्य के शिक्षा वयवस्था को सुदृढ़ बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जायेंगे।

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बिलासपुर– छत्तीसगढ़ राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों की व्यापक फेर बदल हुई है, जिसमें कई अधिकारी के विभाग परिवर्तित कर दिए गए। जहां कुछ के लिए ये अच्छी खबर बन के आई, वहीं कुछ बदलाव समझ से परे है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव शिक्षा विभाग में हुई। नए प्रमुख सचिव आलोक शुक्ला जिन पर भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मुकदमा चल रहा है, उन्हें मात्र चार महीने के लिए प्रभार दे दिया गया है।
आते ही उन्होंने राज्य स्तरीय चलने वाली सारी योजना को गलत और बेकार बता कर अपनी ही योजना को अमलीजामा पहनाना भी शुरू कर दिया। यहां ध्यान देने वाली बात ये भी है, कि जिन योजनाओं को बेकार बताया गया, उसी को अभी अभी पुरस्कृत किया गया है, इतना ही नही उसे पूरे देश भर में सराहा भी गया।

सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार द्वारा केंद्र स्वीकृत “ई-लर्निंग की योजना” जिसमें स्कूल में डिजिटल तरीके से पढ़ने पढ़ाने की व्यवस्था है, जिसका उदघाटन मुख्यमंत्री ने स्वयं अपने हाथो से किया था, उसको भी अयोग्य ठहराया गया। इस महत्वाकांक्षी एवम् बच्चों के लिए लाभकारी योजना, जिसमें सारे तकनीक, लैपटॉप, कंप्यूटर इत्यादि को पूर्व में ही स्वीकृत कर लिया है तथा जिसमें इंस्टॉलेशन का काम भी पूरा हो गया तथा जिसके कारण तकरीबन 1500 रोजगार के अवसर मिलते, अब इसके बदले उन्होंने अपनी ही ई-लर्निंग कार्यक्रम की योजना बनाई है। इसमें योजना में आने वाले 4 महीनों में ही तकरीबन 50 करोड़ से ज्यादा सरकारी रुपए खर्च की योजना है, जिसमें फिर से वही हार्डवेयर और तकनीक को दुबारा से खरीदने का कार्यक्रम तैयार किया गया है। जब राज्य में पहले से ही इस प्रकार की व्यापक व दूरगामी योजना चल रही है, तो फिर से इसके समानांतर योजना चलाने का क्या मकसद हो सकता है?
यहां सवाल उठता है, कि किस आधार पर इस प्रकार का निर्णय लिया गया। इसकी उपयोगिता और प्रभाव को कैसे साबित करेंगे? साथ ही 4 महीने पश्चात फिर से इस योजना का क्या होगा? क्या ये जनता के पैसे का दुरुपयोग नहीं है? साथ ही अगर कोई नुकसान हुआ तो इसकी भरपाई कौन करेगा?
हमारे सूत्रों ने नाम न छापने शर्त पर यह बताया कि इस योजना में ऐसा दिखाया जाएगा कि राज्य के विद्यालयों ने सारे संबंधित समान खरीदे, जबकि सारी खरीदारी एवम् निर्णय पहले ही ले लिए है। राज्य में अधिकारियों द्वारा
छापेख़ाने से होने वाली कमाई पर जहां नकेल कसी थी वहीं ये काम भी अब शुरू होने वाला है।

केंद्र समर्थित योजना जैसे UDISE को भी बकवास बता कर उसमे कुछ भी डाटा भर के भेजने को बोल दिया गया। यह डाटा राज्य के लिए बहुत ही अहम है क्योंकि इसी आधार पर राज्य शिक्षा विभाग में सारी मूलभूत सुविधाएं एवम् कार्यक्रम लागू करता है । यही नहीं केंद्र से मिलने वाली मदद राशि में भी इसकी अहम भूमिका होती है।

ऐसे स्तर से इस प्रकार की बातों का नीचे के पदाधकारियों में जाना जहा अच्छे कर्मठ एवम् ईमानदार लोगों के मनोबल को नुकसान पहुंचता है वहीं भ्रष्ट अधिकारी इसमें अपना लाभ निकाल लेते है। एक ऐसे दागी अधिकारी जिस पर पिछली सरकार में इतने बड़े घोटाले का आरोप लग चुका हो, क्या राज्य की वर्तमान सरकार को उन्हें शिक्षा जैसा विभाग देना उचित है।
आपको बता दें, कि आलोक शुक्ला व उनके साथ के अधिकारियों पर पिछले सरकार में 3 हजार करोड़ के घोटाले का मुकदमा चल रहा, जिस मामले में वे बेल पर हैं।

शिक्षा एक ऐसा विभाग है, जो आम जनता पर सीधे प्रभाव डालता है। लोगों को प्रदेश की सरकार से आशा है, कि इस पर ध्यान दिया जाएगा, आम जन की बेहतरी के लिए राज्य के शिक्षा वयवस्था को सुदृढ़ बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जायेंगे।