Friday, August 19, 2022

सारंगी के सौ रंगों की साधना कर जी रहे नेत्र बाधित राजेश.. जानिए इस वाद्ययंत्र की ख़ासियत..

बिलासपुर– शहर में रहने वाले राजेश कुमार परसरामानी सारंगी में पारंगत हैं, सारंगी ऐसा वाद्य यंत्र है, जिसमें पारंगत बहुत कम लोग हैं। 34 वर्षीय नेत्र बाधित राजेश एसबीआई के मेन ब्रांच में कार्यरत हैं।

छत्तीसगढ़ में सारंगी बजाने वाले कुछ ही लोग हैं, जिनमे से राजेश एक हैं, उनका बचपन से ही संगीत के प्रति झुकाव रहा, और सारंगी उन्हें बहुत पसंद था। वजह इसके वादक बहुत कम है, और सारंगी का अर्थ है, सौ रंगी इसमें जीवन के हर एक रंग है। नेत्र बाधित राजेश जीवन के रंग तो नहीं देख सके, इसलिए सारंगी के इन्हीं सौ रंगों से अपना जीवन संवारने की ठानी।

उन्होंने जयपुर घराने के उस्ताद साबिर खान साहब से इसकी शिक्षा ली। उस्ताद साबिर खान पद्मश्री से सम्मानित मोइनुद्दीन खान के बड़े बेटे हैं।

वर्तमान में एसबीआई की मुख्य शाखा बिलासपुर में सहायक प्रबंधक के पद पर पदस्थ हैं, और भारतीय शास्त्रीय संगीत में गुरू शिष्य परंपरा के अन्तर्गत सारंगी सीख रहे हैं। उनका कहना है, कि सीखना जीवन पर्यन्त चलता रहता है। सारंगी का एक विस्तृत परिवार है, सारंगी का विभाजन बहुत बड़ा है। राजेश ढाई पसली सारंगी और सिंधी सारंगी दोनों बजाते हैं।

उन्होंने बताया, कि अब तक सारंगी का न तो मानकीकरण हुआ है, न ही सारंगी पर कोई किताब उपलब्ध है। उन्होंने सारंगी पर विस्तृत अध्यन किया है, उनके पास खुद के नोट्स हैं। गांव में बजने वाली चिकारी से लेकर शास्त्रीय संगीत में बजने वाली सारी सारंगियो को अपने ने समेट लेती है।

राजेश का कहना है, कि जिस प्रकार प्यास पानी पीने से बुझती है, ओस की बूंदों से नहीं.. ठीक उसी प्रकार आत्मा को सुकून मिलना, और आत्मा के संगीत की सुधा शांत करना केवल शास्त्रीय संगीत से ही मुमकिन है।

GiONews Team
Editor In Chief

4 COMMENTS

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बिलासपुर– शहर में रहने वाले राजेश कुमार परसरामानी सारंगी में पारंगत हैं, सारंगी ऐसा वाद्य यंत्र है, जिसमें पारंगत बहुत कम लोग हैं। 34 वर्षीय नेत्र बाधित राजेश एसबीआई के मेन ब्रांच में कार्यरत हैं।

छत्तीसगढ़ में सारंगी बजाने वाले कुछ ही लोग हैं, जिनमे से राजेश एक हैं, उनका बचपन से ही संगीत के प्रति झुकाव रहा, और सारंगी उन्हें बहुत पसंद था। वजह इसके वादक बहुत कम है, और सारंगी का अर्थ है, सौ रंगी इसमें जीवन के हर एक रंग है। नेत्र बाधित राजेश जीवन के रंग तो नहीं देख सके, इसलिए सारंगी के इन्हीं सौ रंगों से अपना जीवन संवारने की ठानी।

उन्होंने जयपुर घराने के उस्ताद साबिर खान साहब से इसकी शिक्षा ली। उस्ताद साबिर खान पद्मश्री से सम्मानित मोइनुद्दीन खान के बड़े बेटे हैं।

वर्तमान में एसबीआई की मुख्य शाखा बिलासपुर में सहायक प्रबंधक के पद पर पदस्थ हैं, और भारतीय शास्त्रीय संगीत में गुरू शिष्य परंपरा के अन्तर्गत सारंगी सीख रहे हैं। उनका कहना है, कि सीखना जीवन पर्यन्त चलता रहता है। सारंगी का एक विस्तृत परिवार है, सारंगी का विभाजन बहुत बड़ा है। राजेश ढाई पसली सारंगी और सिंधी सारंगी दोनों बजाते हैं।

उन्होंने बताया, कि अब तक सारंगी का न तो मानकीकरण हुआ है, न ही सारंगी पर कोई किताब उपलब्ध है। उन्होंने सारंगी पर विस्तृत अध्यन किया है, उनके पास खुद के नोट्स हैं। गांव में बजने वाली चिकारी से लेकर शास्त्रीय संगीत में बजने वाली सारी सारंगियो को अपने ने समेट लेती है।

राजेश का कहना है, कि जिस प्रकार प्यास पानी पीने से बुझती है, ओस की बूंदों से नहीं.. ठीक उसी प्रकार आत्मा को सुकून मिलना, और आत्मा के संगीत की सुधा शांत करना केवल शास्त्रीय संगीत से ही मुमकिन है।