Saturday, August 13, 2022

गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही बना जिला, इसे गढ़ना हम सब की जिम्मेदारी

गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही बहुप्रतीक्षित जिला बनकर तैयार हो गया है . इस जिले का स्वरूप कैसा होना चाहिए यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी न केवल शासन प्रशासन की होगी अपितु इस नए जिले को सुंदर गढ़ने में हम सभी की महती भूमिका होनी चाहिए।

जैसा कि नए जिले के विकसित ढांचे के निर्माण में यहाँ का भूगोलिक वातावरण , पर्यटन स्थल , स्वास्थ एवं शिक्षा के ढांचे में सभी के समर्पण भाव से एक नई तस्वीर बनाने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय प्रतिनिधियों की सकारात्मक सोच से ही संभव हो सकेगा।

विगत 22 वर्षों से की जा रही मांग को मूर्त रूप देने का साहस वर्तमान शासन के मुखिया भूपेश बघेल द्वारा किया गया . वही यह तथ्य भी सही है कि इस नावनिर्मित जिले को 15 वर्षो से लगातार भाजपा शाषित शासन द्वारा भी किया जा सकता था परंतु आंतरिक रूप वर्तमान विधायक अजित जोगी के साथ गठबंधन के कारण भाजपा इनके मोह एवं राजनीतिक स्वार्थ और अतिमहत्वाकांषा के कारण जिले का सौगात देने का साहस तत्कालीन शासन नही कर सकी . तो इसे हम क्षेत्रवासी दुर्भाग्य मानते है . यही सही है कि वर्तमान शासन अपने वादे के अनुसार गौरेला – पेण्ड्रा – मरवाही को जिला बनाकर एक नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया है . ऐसे में भाजपा समर्पित भी इस शासन के मुरीद हो गए है . वही सभी ने प्रदेश के मुखिया को साधुवाद करते नही थक रहे है।

अब प्रश्न यह है कि नए जिले का सर्वागौण ढांचा कैसे होना चाहिए . इस नावनिर्मित जिले को सुंदर से सुंदरतम कैसे बनाया जा सकता है।

महत्वपूर्ण है कि एशिया महाद्वीप के ग्रीन बेल्ट कहा जाने वाला एवं माँ नर्मदा की तराई में बसा गौरेला – पेण्ड्रा – मरवाही अपने स्वक्ष एवं सुंदर वातावरण के लिए पूरे छत्तीसगढ़ में नही अपितु पूरे देश मे इसकी अलग ऐतिहासिक पहचान है तभी तो यहाँ पर गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर अपनी टीवी बीमार पत्नी का इलाज कराने यहाँ आये थे। यहाँ का भूगौलिक वातावण ऐसा है कि मैकल श्रेणियों से घिरा यह क्षेत्र अपने अद्भुत सुंदरता लिए सहज ही सैलानियो का मन मोह लेता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरवाही क्षेत्र को भालुओं का गढ़ माना जाता है जहाँ पिछले दो दशक पहले भालुओं की संख्या लगभग 1400 हुआ करती थी जो आज इनके हो रहे लगातार शिकार एवं एवं नेरसंगिक रहवास और भालुओं के भोजन संबधी सारी दुर्गति होने के पश्यात भी आज लगभग 400 के लगभग भालूओ की संख्या आंकी जा रही है। इतना ही नही यहाँ पर सफेद भालुओं की दुर्लभ प्रजाति के लिए भी मरवाही विख्यात है।

इस जिले के चारो तरफ अवैध उत्खनन से लगातार जंगल एवं भालुओं का नेरसंगिक निवास खत्म हो गया है . मरवाही में दैत्याकार पत्थर उगलने वाली मशीनों के ध्वनि अवैध उत्खनन से भालुओ का नेरसंगिक निवास नष्ट हो गया है . तब हम सफेद भालू सहित भालुओं के संरक्षण की थोथी कल्पना कैसे कर सकते है ? ऐसे में वन्य प्राणियों का संरक्षण एवं संवर्धन संभव नही है।

यहाँ प्रकृतिक संपदा की भी बाहुल्यता है पर माफियाओं के चक्रव्यूह का शिकार हो गया है . अब सबसे पहले शासन एव प्रशासन को मिल कर इस पूरे क्षेत्र में अवैध उत्खनन भालुओं का नेरसंगिक निवास एवं वन्य प्राणियों के लिए भोजन के लिए नष्ट हो रहे जंगलों एवं जंगलों में हो रहे लगातार बेजा कब्जा को रोक कर नए सिरे से क्षेत्र के घने जंगलों को पुनः संवारना होगा।

पर्यटन के लिए पर्यटन स्थल को भी संजोने एवं संवारने की आवश्यकता होगी . पर्यटन के लिए प्रासंगिक स्थल जो अपनी ऐतिहासिक पहचान खो रही है उन्हें पुनः संवारने की आवश्यकता होगी।

यहाँ स्वास्थ की बात करे तो यहाँ मृत्यु दर स्वास्थ सुविधाओ के अभाव के कारण बहुत ज्यादा है .कुशल चिकित्सक एवम आवश्यक संसाधनों के अभाव में इलाज के दौरान या समयकाल कवलित होते क्षेत्र की बड़ी विडंबना है . अब नावनिर्मित जिले से सहज ही आस बढ़ जाती है कि स्वास्थ्य सुविधाएं दुरुष्ट होंगे।

अब अगर शिक्षा की बात करे तो इस आदिवासी बाहुल्य जिले में शिक्षा की व्यवस्था काफी लचर है जहाँ शासकीय शिक्षा की मृतप्राय व्यवस्था के कारण प्राइवेट विद्यालय खूब फल फूल रहे है अच्छी शिक्षा के नाम पर क्षेत्र की जनता भी इसको करती जा रही है . वही शासकीय शिक्षा के अभाव एवं अव्यवस्था के कारण दम तोड़ रहा है . ऐसे में शासकीय शिक्षा व्यवस्था के प्रति विश्वाश कैसे कायम हो पायेगा यह चिंतनीय विषय है।

जहाँ एक ओर शासकीय विद्यालयो के लिए शासन सत्तत प्रयासरत है . शासकीय विद्यालयों में लगे कर्मचारियों से पढ़ाई के अलावा बाकी सभी कार्य कराए जाते है जिससे शासकीय कर्मचारियों को अच्छा परिणाम नही आने का बढ़िया कारण बन जाता है . वही प्राइवेट संस्थाओं को चना-मुर्रा टाइप मान्यता प्रदान कर शासकीय विद्यालयों के प्रति और विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा रहा है . शासकीय विद्यालयों के प्रति विश्वसनीयता खत्म सो होती जा रही है। प्राइवेट विद्यालय की गुणवत्ता का आंकलन केवल उनकी ऊंची फीस से होती है और धरातल पर कुछ और ही होता है . प्राइवेट विद्यालय संचालित करने वाले अपनी ऊंची पहुँच पैसा एवं रुतबा के कारण धड़ल्ले से शिक्षा का अवैध और अनैतिक व्यापार कर रातों रात पूंजीपति होते जा रहे है . और क्षेत्र की जनता की जेब पर खुलेआम डकैती पड़ रही है . जिस ओर से शासन भी पंगु बना बैठा है . शिक्षा देश की रीढ़ है इसका निजीकरण देश की रीढ़ को कमजोर बना देगा।

बात करे नवनिर्मित जिले गौरेला – पेण्ड्रा – मरवाही के साथ प्रदेश के मुखिया ने पसान का राजस्व निरीक्षक क्षेत्र भी शामिल करने की बात कही है . यह पसान का राजस्व निरीक्षक क्षेत्र भी व्यापक है जहाँ पर जंगली संपदा , प्राकृतिक सौंदर्य , एवं पर्यटन क्षेत्र के लिए काफी मशहूर है इस क्षेत्र में साल वनों एवं अन्य सेमर , महुआ , तेंदू , चार , साजा , हर्रा बहेरा एवं वन जंगली बूटियों का प्रचुर भंडार है।

वही इस जिले का रोजगार मुलक योजनाओं का क्रियान्वयन की दिशा में भी समग्र रूप रेखा तैयार होना चाहिए जिससे क्षेत्र श्रमिक वर्ग एवं शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मुहैया हो सके . इसके लिए लघु उद्योग , कुटीर उद्योग और आद्योगिक क्षेत्र के विकास की रूपरेखा सुनिश्चित होनी चाहिए . मजदूरों के पलायन एवं शोषण से उबारने के लिए समग्र उपाय भी आवश्यक है।
क्षेत्रीय भाषा , संस्कृति एवं ग्रामीण मान्यताओं रीति रिवाज पुरानी परंपराओं को भी संरक्षित करने की आवश्यकता है . क्षेत्र में विलुप्त होती मान्यायाओ को पुनर्स्थापित करने की भी आवश्यकता होगी . आदिवासीयो की पुरानी अधिमान्यताये , रीति रिवाज , का अपना विशेष स्थान है जो इस आधुनिकता की दौड़ में विलुप्त होती जा रही है।

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जैसा कि नए जिले के विकसित ढांचे के निर्माण में यहाँ का भूगोलिक वातावरण , पर्यटन स्थल , स्वास्थ एवं शिक्षा के ढांचे में सभी के समर्पण भाव से एक नई तस्वीर बनाने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय प्रतिनिधियों की सकारात्मक सोच से ही संभव हो सकेगा।

विगत 22 वर्षों से की जा रही मांग को मूर्त रूप देने का साहस वर्तमान शासन के मुखिया भूपेश बघेल द्वारा किया गया . वही यह तथ्य भी सही है कि इस नावनिर्मित जिले को 15 वर्षो से लगातार भाजपा शाषित शासन द्वारा भी किया जा सकता था परंतु आंतरिक रूप वर्तमान विधायक अजित जोगी के साथ गठबंधन के कारण भाजपा इनके मोह एवं राजनीतिक स्वार्थ और अतिमहत्वाकांषा के कारण जिले का सौगात देने का साहस तत्कालीन शासन नही कर सकी . तो इसे हम क्षेत्रवासी दुर्भाग्य मानते है . यही सही है कि वर्तमान शासन अपने वादे के अनुसार गौरेला – पेण्ड्रा – मरवाही को जिला बनाकर एक नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया है . ऐसे में भाजपा समर्पित भी इस शासन के मुरीद हो गए है . वही सभी ने प्रदेश के मुखिया को साधुवाद करते नही थक रहे है।

अब प्रश्न यह है कि नए जिले का सर्वागौण ढांचा कैसे होना चाहिए . इस नावनिर्मित जिले को सुंदर से सुंदरतम कैसे बनाया जा सकता है।

महत्वपूर्ण है कि एशिया महाद्वीप के ग्रीन बेल्ट कहा जाने वाला एवं माँ नर्मदा की तराई में बसा गौरेला – पेण्ड्रा – मरवाही अपने स्वक्ष एवं सुंदर वातावरण के लिए पूरे छत्तीसगढ़ में नही अपितु पूरे देश मे इसकी अलग ऐतिहासिक पहचान है तभी तो यहाँ पर गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर अपनी टीवी बीमार पत्नी का इलाज कराने यहाँ आये थे। यहाँ का भूगौलिक वातावण ऐसा है कि मैकल श्रेणियों से घिरा यह क्षेत्र अपने अद्भुत सुंदरता लिए सहज ही सैलानियो का मन मोह लेता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरवाही क्षेत्र को भालुओं का गढ़ माना जाता है जहाँ पिछले दो दशक पहले भालुओं की संख्या लगभग 1400 हुआ करती थी जो आज इनके हो रहे लगातार शिकार एवं एवं नेरसंगिक रहवास और भालुओं के भोजन संबधी सारी दुर्गति होने के पश्यात भी आज लगभग 400 के लगभग भालूओ की संख्या आंकी जा रही है। इतना ही नही यहाँ पर सफेद भालुओं की दुर्लभ प्रजाति के लिए भी मरवाही विख्यात है।

इस जिले के चारो तरफ अवैध उत्खनन से लगातार जंगल एवं भालुओं का नेरसंगिक निवास खत्म हो गया है . मरवाही में दैत्याकार पत्थर उगलने वाली मशीनों के ध्वनि अवैध उत्खनन से भालुओ का नेरसंगिक निवास नष्ट हो गया है . तब हम सफेद भालू सहित भालुओं के संरक्षण की थोथी कल्पना कैसे कर सकते है ? ऐसे में वन्य प्राणियों का संरक्षण एवं संवर्धन संभव नही है।

यहाँ प्रकृतिक संपदा की भी बाहुल्यता है पर माफियाओं के चक्रव्यूह का शिकार हो गया है . अब सबसे पहले शासन एव प्रशासन को मिल कर इस पूरे क्षेत्र में अवैध उत्खनन भालुओं का नेरसंगिक निवास एवं वन्य प्राणियों के लिए भोजन के लिए नष्ट हो रहे जंगलों एवं जंगलों में हो रहे लगातार बेजा कब्जा को रोक कर नए सिरे से क्षेत्र के घने जंगलों को पुनः संवारना होगा।

पर्यटन के लिए पर्यटन स्थल को भी संजोने एवं संवारने की आवश्यकता होगी . पर्यटन के लिए प्रासंगिक स्थल जो अपनी ऐतिहासिक पहचान खो रही है उन्हें पुनः संवारने की आवश्यकता होगी।

यहाँ स्वास्थ की बात करे तो यहाँ मृत्यु दर स्वास्थ सुविधाओ के अभाव के कारण बहुत ज्यादा है .कुशल चिकित्सक एवम आवश्यक संसाधनों के अभाव में इलाज के दौरान या समयकाल कवलित होते क्षेत्र की बड़ी विडंबना है . अब नावनिर्मित जिले से सहज ही आस बढ़ जाती है कि स्वास्थ्य सुविधाएं दुरुष्ट होंगे।

अब अगर शिक्षा की बात करे तो इस आदिवासी बाहुल्य जिले में शिक्षा की व्यवस्था काफी लचर है जहाँ शासकीय शिक्षा की मृतप्राय व्यवस्था के कारण प्राइवेट विद्यालय खूब फल फूल रहे है अच्छी शिक्षा के नाम पर क्षेत्र की जनता भी इसको करती जा रही है . वही शासकीय शिक्षा के अभाव एवं अव्यवस्था के कारण दम तोड़ रहा है . ऐसे में शासकीय शिक्षा व्यवस्था के प्रति विश्वाश कैसे कायम हो पायेगा यह चिंतनीय विषय है।

जहाँ एक ओर शासकीय विद्यालयो के लिए शासन सत्तत प्रयासरत है . शासकीय विद्यालयों में लगे कर्मचारियों से पढ़ाई के अलावा बाकी सभी कार्य कराए जाते है जिससे शासकीय कर्मचारियों को अच्छा परिणाम नही आने का बढ़िया कारण बन जाता है . वही प्राइवेट संस्थाओं को चना-मुर्रा टाइप मान्यता प्रदान कर शासकीय विद्यालयों के प्रति और विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा रहा है . शासकीय विद्यालयों के प्रति विश्वसनीयता खत्म सो होती जा रही है। प्राइवेट विद्यालय की गुणवत्ता का आंकलन केवल उनकी ऊंची फीस से होती है और धरातल पर कुछ और ही होता है . प्राइवेट विद्यालय संचालित करने वाले अपनी ऊंची पहुँच पैसा एवं रुतबा के कारण धड़ल्ले से शिक्षा का अवैध और अनैतिक व्यापार कर रातों रात पूंजीपति होते जा रहे है . और क्षेत्र की जनता की जेब पर खुलेआम डकैती पड़ रही है . जिस ओर से शासन भी पंगु बना बैठा है . शिक्षा देश की रीढ़ है इसका निजीकरण देश की रीढ़ को कमजोर बना देगा।

बात करे नवनिर्मित जिले गौरेला – पेण्ड्रा – मरवाही के साथ प्रदेश के मुखिया ने पसान का राजस्व निरीक्षक क्षेत्र भी शामिल करने की बात कही है . यह पसान का राजस्व निरीक्षक क्षेत्र भी व्यापक है जहाँ पर जंगली संपदा , प्राकृतिक सौंदर्य , एवं पर्यटन क्षेत्र के लिए काफी मशहूर है इस क्षेत्र में साल वनों एवं अन्य सेमर , महुआ , तेंदू , चार , साजा , हर्रा बहेरा एवं वन जंगली बूटियों का प्रचुर भंडार है।

वही इस जिले का रोजगार मुलक योजनाओं का क्रियान्वयन की दिशा में भी समग्र रूप रेखा तैयार होना चाहिए जिससे क्षेत्र श्रमिक वर्ग एवं शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मुहैया हो सके . इसके लिए लघु उद्योग , कुटीर उद्योग और आद्योगिक क्षेत्र के विकास की रूपरेखा सुनिश्चित होनी चाहिए . मजदूरों के पलायन एवं शोषण से उबारने के लिए समग्र उपाय भी आवश्यक है।
क्षेत्रीय भाषा , संस्कृति एवं ग्रामीण मान्यताओं रीति रिवाज पुरानी परंपराओं को भी संरक्षित करने की आवश्यकता है . क्षेत्र में विलुप्त होती मान्यायाओ को पुनर्स्थापित करने की भी आवश्यकता होगी . आदिवासीयो की पुरानी अधिमान्यताये , रीति रिवाज , का अपना विशेष स्थान है जो इस आधुनिकता की दौड़ में विलुप्त होती जा रही है।